दुनिया में पहचान अहंकार से नहीं संस्कार से बनती है-मुनिश्री

Dec 18 2021

ग्वालियर। दुनिया में पहचान अहंकार से नहीं संस्कार से बनती है जिसके जीवन में संस्कार होते हैं वह दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बना लिया करते हैं। विनयवान व्यक्ति जीवन में बहुत उन्नति प्राप्त करता है। ज्ञान प्राप्त करना सरल है, लेकिन ज्ञान के साथ-साथ विनय होना बहुत कठिन है। ज्ञान अंगूठी है और विनय उसमें चढ़ा हुआ नग है। अदब सीखना है तो कलम से सीखो, जब भी चलती है तो सर झुका कर के चलती है। यह विचार  मुनिश्री विहर्ष सागर महाराज ने शनिवार को नई सड़क स्थित चंपाबाग धर्मशाल में धर्मसाभ को संबोधित करते हुए कही। मंच पर मुनिश्री विजयेश सागर महाराज, मुनिश्री विनिबोध सागर महाराज व ऐलक विनियोग सागर महाराज मौजूद थे।
मुनिश्री ने कहा कि जिसके जीवन में नम्रता, कोमलता एवं गुणग्रहण की दृष्टि हुआ करती है वह अपने जीवन में बहुत आगे उन्नति कर लेता है। विनय के साथ विद्या प्राप्त होती है, धन प्राप्त होता है। वहीं जो व्यक्ति अहंकारी होता है वह भोजन में कंकड़ के समान होता है और जो व्यक्ति विनयवान होता है वह जीरा के समान होता है। कंकड़ से कुरकुरा भी किरकिरा हो जाता है और जीरा डालने से उसमें स्वाद और जायका बढ़ जाता है। इसलिए अपने जीवन में अहंकार को स्थान ना देते हुए विनय गुण ही स्थान दें, क्योंकि विनय के माध्यम से लोग आकर्षित होते हैं।
जिंदगी बर्बाद करता है धन का नशा
मुनिश्री ने कहा कि शराब से ज्यादा नशा धन का होता है। शराब का नशा तो दो-चार घन्टे बाद ही उतर जाता है, लेकिन धन का नशा तो जिंदगी बर्बाद करने के बाद ही उतरता है। धन का अहंकार रखने वालों के बारे में मुनिश्री ने कहा कि पैसा कुछ भी हो सकता है, बहुत कुछ हो सकता है, लेकिन सब कुछ नहीं हो सकता। हर आदमी को धन की अहमियत समझना बहुत जरूरी है। धनाढ्य होने के बाद भी यदि लालच और पैसों का मोह है, तो उससे बड़ा गरीब और कोई नहीं हो सकता है। प्रत्येक व्यक्ति लाभ की कामना करता है, लेकिन उसका विपरीत शब्द अर्थात भला करने से दूर भागता है।