सिद्धांशु भारद्वाज की कलम से

May 25 2021


जो मैने देखा है, जो मैने महसूस किया है,बस उसे ही आपके सामने रखने की कोशिश कर रहा हूं, जरूरी नहीं आप मुझसे सहमत हो ,एक अर्थी को कंधा देना कितना ही पवित्र या पुण्य का काम क्यों ना हो, लेकिन उस मरे हुए मृत व्यक्ति को कोई फर्क नहीं पड़ता कि किसने कांधा दिया किसने नहीं ,दरअसल हमारी इंसानियत की कसौटी तो तभी परखी जा चुकी थी जब मृत व्यक्ति जीवित था ,तब हमने सहारे का कितना हाथ उसके आगे भड़ाया था ,जैसे ही किसी के मरने की खबर आयी तब हम भागदौड़ शुरू कर देते है लेकिन जब वह तकलीफ में था तब हम क्यों नहीं दौड़े, सच तो यह है कि अर्थी के समय या मरने के बाद की भागदौड़ ही व्यर्थ है ,क्योंकि हम नहीं जाएंगे तब भी उसका अंतिम संस्कार होना ही है ,सफेद कपड़ों में उदास चेहरों के साथ हाजरी लगाना फेशन हो चला है, हम अपने सच्चे इंसानी रिश्तों को भूल चले है ,किसकी अंतिम यात्रा में ज्यादा लोग रहते है, ये भी स्टेटस सिम्बोल हो गया है, वरना तो लोग पूरा जलाने या दफनाने तक भी नहीं रुकतेअभी है, अभी नहीं, ये वाली जिंदगी में दिखावा कैसा, जीतेजी जिंदा लोगो में से ,जिंदगी की जंग लड़ते लोगो के लिए कुछ कर जाए वही सच्ची सेवा ओर सबसे बड़ा पुण्य है, यकीन मानिए फिर आपने कांधा दिया या नहीं दिया ये मैटर ही नहीं करेगा, बस आपको सुकून मिलेगा ,कभी ऐसा करके देखिए आपको बहुत अच्छा लगेगा, हाथ भडाकर किसी का सहारा बनकर देखिए अच्छा लगेगा ,ऐसे दिखावे से आप भले ही आपकी सोच जैसे लोगो के सामने हीरो सिद्ध हो जाएंगे ,लेकिन सच्चा हीरो इंसान तब बनता है जब उसकी अंतर आत्मा उसे एहसास कराती है ,क्योंकि यकीन रखिए परमात्मा आपके किए गए हर कर्म पर अपनी नजर रखे हुए है, कर्मो का फल सब यहीं है , सच्ची सेवा पर ध्यान लगाए, जीतेजी सबके काम आए, दीन दुखी का सहारा बने ,मानव सेवा ही माधव सेवा है