वैचारिक अधिष्ठान पर खड़ी भाजपा लोकतंत्र की थाती भी है-रणवीर सिंह रावत

Apr 05 2021

ग्वालियर। भाजपा के पहले राष्ट्रीय अधिवेशन को मुंबई में संबोधित करते हुए अटलजी ने कहा था "जो लोकतंत्र से खिलवाड़ करना चाहते हैं,उन्हें इतिहास लोकचेतना की तूफानी धारा में बहाकर ले जायेगा।भारतीय जनता पार्टी राजनीति में, राजनीतिक दलों में तथा राजनेताओं में जनता के खोये हुए विश्वास को पुन: स्थापित करने के लिए जमीन से जुड़ी राजनीति करेगी। पद, पैसा, और प्रतिष्ठा के पीछे पागल होनेवालों के लिए हमारे यहां कोई जगह नही है। जिनमे आत्मसम्मान का आभाव हो, वे दरबार में जाकर मुजरे झाड़े, हम तो एक हाथ में भारत का संविधान औऱ दूसरे में समता का निशान लेकर मैदान में जूझेंगे।
देश के पश्चिमी घाट को मंडित करने वाले महासागर के किनारे खड़े होकर मैं यह भविष्यवाणी करने का साहस करता हूँ कि अंधेरा छंटेगा, सूरज निकलेगा, कमल खिलेगा।"
41 साल बाद भारत का कोई तट या क्षेत्र ऐसा नही है जहां कमल नही खिल रहा हो। भारत की संसदीय राजनीति में भाजपा एक अनिवार्यता बनकर सुस्थापित हो चुकी है। एक नए भारत को आकार देती भाजपा संविधान और समता के अटल संकल्प के साथ जनाकांक्षाओं का सबसे प्रमाणिक प्रतिबिम्ब के रूप में अधिमान्यता पर खड़ी है। पार्टी का आज का नेतृत्व करोड़ों नागरिकों के मध्य राजनीतिक भरोसे को कायम करने में भी कामयाब रहा है। जिस दर्शन को पार्टी ने अपनी जनसंघ पहचान के साथ खुद से सयुंक्त किया था उसके प्रति अटूट प्रतिबद्धता ने ही देश में लोकतंत्र और भाजपा में भरोसे की मौजूदा इबारत को लिखने का काम किया है। एक लंबी और अनथक वैचारिक संघर्ष यात्रा भी आज के राजनीतिक उत्कर्ष में पार्टी के साथ जुड़ी रही है। अटल जी ने संसद में कहा था कि वे सिद्धान्तहीन, मूल्यहीन औऱ जोड़तोड़ की सत्ता को चिमटे से छूना भी पसंद नही करूँगा। आज दुनिया के सबसे बड़े संसदीय लोकतंत्र में भाजपा को किसी सिद्धान्तहीन सत्ता की वाकई आवश्यकता नही है। करोडों नागरिक भरोसे की डोर के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा को देश चलाने का जनादेश दे रहे है। देश का ऐसा कोइ कोना नही है जहाँ लोग भाजपा के प्रति आशा और भरोसे से नही देखते हो। यह सुखद राजनीतिक स्थिति किसी परिवारशाही या नकली समाजवाद की कोख से  निर्मित नही हुई है। पार्टी के वैचारिक अधिष्ठान को जिस ईमानदारी के साथ डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय, नानाजी देशमुख, अटल जी, आडवाणी जी, डॉ मुरलीमनोहर जोशी जैसे महापुरुषों ने खड़ा किया है उसका अपना एक संसदीय वैशिष्ट्य भी रहा है। हर परिस्थितियों में इसी वैचारिक प्राणवायु ने लाखों लाख कार्यकर्ताओं का समुच्चय खड़ा किया।70 साल तक बगैर विचलन के जो अहर्निश समाज कार्य भाजपा ने देश के लिए किया उसकी मिसाल अन्यत्र नही मिल सकती है। कांग्रेस ने सत्ता के लिए संविधान और लोकतंत्र की हत्या तक करने में संकोच नही किया क्योंकि उनके लिए सत्ता ही साध्य रही है लेकिन भाजपा की वैचारिक निधि लोकतंत्र पर टिकी है इसीलिए केवल लोकतंत्र बचाने के लिए अपनी जनसंघ की सरंचनात्मक एवं लोकस्थापित पहचान को जनता पार्टी में समाहित करने में हमारे पूर्वजों ने तनिक भी देर नही की।यह लोकतंत्र के प्रति हमारी सत्यनिष्ठा का चरम प्रमाण था।जनता पार्टी से बाहर आकर भाजपा के रुप में हमारी यात्रा वैचारिक अधिष्ठान के प्रति वचनबद्धता का नतीजा थी क्योंकि सत्ता को हमने साध्य कभी माना ही नही। हमारे राजनीतिक दर्शन में भारत के प्रति द्रष्टिकोण किसी उपनिवेश की तरह नही है बल्कि "भारत माता"की अधिमान्यता हमारे इष्ट देव की तरह रहा है।यही कारण है कि जनता पार्टी से हमारे रास्ते अलग हुए।भारत को जमीन का टुकड़ा मानने वाली राजनीतिक सोच के विरुद्ध हमारी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की थियरी पर आज सारा राष्ट्र भाजपा के साथ अगर खड़ा हुआ नजर आ रहा है तो इसके मूल में हमारी सिद्धान्तप्रियता औऱ सतत लोकतांत्रिक संघर्ष ही है।धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद के नाम पर जिस तरह नकली प्रस्थापनाओं को खड़ा कर भारत के स्वत्व को नकारा गया उसके प्रति भाजपा और पितृ संगठन आरएसएस की संघर्ष यात्रा में इतने कठिन दौर भी आए जब हम टूट सकते थे लेकिन राजनीति में प्रमाणिक वैचारिकी पर खड़ी हमारी सम्रद्ध परम्परा ने हमें मजबूती से लोगों के मध्य खड़ा रखा है।आज अल्पसंख्यकवाद की दुकानें बंद हो गई है, समाजवाद के परिवार गिरोह अप्रसांगिक हो चुके है।भाजपा के झंडे के नीचे वास्तविक सामाजिक न्याय फलफूल रहा है।समाज के उन वर्गों को सत्ता में भागीदारी सुनिश्चित हुई है जिनके लिए सामाजिक न्याय और समाजवाद गढ़े गए थे।बहुसंख्यक का मानमर्दन करती सेक्युलरिज्म की दलीलें औऱ माय जैसे चुनावी समीकरण इतिहास के कूड़ेदान में जा चुके है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का शासन मंत्र"सबका साथ,सबका विकास और सबका विश्वास"नए भारत को आकार दे रहा है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी तुष्टिकरण की जगह पुष्टिकरण के पक्षधर थे।गर्व के साथ भाजपा का कार्यकर्ता यह कह सकता है कि देश में अब तुष्टीकरण नही हो रहा है। कोई यह दावा नही कर सकता है कि प्रधानमंत्री आवास,उज्ज्वला,किसान सम्मान निधि, जनधन जैसी योजनाओं का फायदा किसी को अल्पसंख्यक होने के कारण नही मिला हो। कोई मप्र में शिवराज सरकार के दौर में यह भी नही कह सकता कि जाति, वर्ग, सम्प्रदाय के बल पर किसी हितग्राहीमूलक योजनाओं से वंचित किया गया हो। यह असल मायनों में भाजपा के सुशासन का अन्त्योदयी संस्करण है। लोककल्याण के इस अन्त्योदयी दर्शन को पार्टी ने राजनीतिक न्याय के ढांचे में भी इसी शिद्दत से समेटा है। आज पार्टी के पास सर्वाधिक पिछड़े, दलित वनवासी वर्ग के सांसद, विधायक है। यह प्रतिनिधित्व ऐतिहासिक समावेशिता धारण किये हुए यानी परिवारशाही के इतर सर्वव्यापी औऱ सर्वस्पर्शी केंद्रित भागीदारी को केवल भाजपा ने सत्ता से लेकर संगठन तक मे आकार दिया है। यह कोई साधारण राजनीतिक घटनाक्रम नही है बल्कि भारत के स्वत्व का प्रकटीकरण भी है। पार्टी ने जिस दर्शन को राष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ में आत्मसात किया था उसे नरेंद्र मोदी के सशक्त नेतृत्व में देश ने सात साल में प्रमाणिकता से जांचा परखा है। आज भारत वैश्विक व्यवस्था में अपनी स्वाभाविक स्थिति को तेजी से ग्रहण कर रहा है।कोविड संकट में भारत के वैश्विक लीडर के रूप में उभरते हुए करोडों देशवासी अपनी आंखों से देख रहे है।सीमाओं पर आज एक मजबूत राष्ट्र के रूप में भारत की भूमिका को पूरी दुनियां ने मान्यता दी है।यह सब भाजपा के सशक्त वैचारिक अधिष्ठान से निकले नेतृत्व के बल पर हो रहा है।इसलिए स्वाभाविक ही है कि कश्मीर से कन्याकुमारी औऱ कामरूप से कटक तक एक भारत श्रेष्ठ भारत का हमारा विचार फलीभूत हो रहा है और जो खुद को स्वाभाविक शासक कहते रहे है वे आज अपनी प्रासंगिकता के लिए तरस रहे है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते है कि सरकार बहुमत से चलती है लेकिन देश सहमति से चलता है आज देश भाजपा के साथ है इसीलिए विपक्षी दल सिद्धान्त औऱ विचार छोड़कर भाजपा के विरुद्ध एकजुट हो रहे है। लेकिन सत्ता के लिए समवेत एकजुटता कभी स्थाई नही होती है यह भी दीवार पर लिखी इबारत की तरह सुस्प्ष्ट है। अटल जी का हर कथन आज सच साबित हो रहा है इसलिए सिर्फ सत्ता के लिए एकजुट होने वालों को उनकी इस भविष्यवाणी को भी याद रखना चाहिये 
"इतिहास लोकचेतना की तूफानी धारा में बहाकर ले जाएगा" आधे तक बह चुके विपक्षी दल अभी भी इसे समझ लें तो लोकतंत्र के लिए बेहतर होगा।
भाजपा के स्थापना दिवस पर लाखों कार्यकर्ताओं का आत्मीय अभिनंदन।
( लेखक मप्रभाजपा के महामंत्री एवं पूर्व विधायक है)