स्वास्थ्य समस्याओं और 14वें आईवीएफ सर्किल के बाद नासिक की महिला देगी जुड़वा बच्चों को जन्म

Mar 10 2021

नासिक: हिम्मत न हारे तो जीत निश्चित होती है। ये बात किताबों से निकल कर अब हमारे जीवन में भी देखने को मिल जाती है। इस बात का जीता जागता उदहारण प्रस्तुत किया है नासिक के रहने वाले अभि और विभा (काल्पनिक नाम ) ने। शादी के 15 साल हो चुके हैं। दोनों एक बच्चे के माता पिता भी हैं। लेकिन हम दो हमारे दो के सपने को संजोने वाले ये दम्पति ,अपने सपने को साकार करने निकल चुके थें। लगातार प्रयास से जब विभा गर्भधारण न कर सकीं तो इन्होंने विज्ञान का शरण लेना उचित समझा और सहायक प्रजनन तकनीक (एआरटी) का उपयोग करके स्वाभाविक रूप से गर्भ धारण करने की कोशिश की और रूख किया शहर स्थित देश के बैहतरीन आईवीएफ सेंटर ,इंदिरा आईवीएफ की ओर। 
 जहाँ पहुंच कर 36 वर्षीय विभा ने क्रोनिक हाइपरटेंशन और हाइपोथायरायडिज्म होने की सूचना दी। फिर फर्टिलिटी टेस्ट्स करने पर पाया गया कि एडिनोमायोसिस है।  विदित हो कि ऐडेनोमायोसिस महिलाओं में होने वाली ऐसी बीमारी है जिसमें गर्भाशय की मांसपेशियों के भीतर के लाइनिंग टिश्यू (एंडोमीट्रियम) का स्थानान्तरण गलत जगह पर होने से गर्भाशय की मांसपेशियों में सूजन आ जाती है। इतना ही नहीं विभा के बाईं फैलोपियन ट्यूब तरल पदार्थ (बाएं टर्मिनल हाइड्रोसालपिनक्स) से अवरुद्ध थे। इधर अभि के वीर्य के नमूने का विश्लेषण करने पर, उनके ओलिगोएस्टेनेथोएटेरोज़ोस्पर्मिया यानी ओएटी का पता चला। इस स्थिति को शुक्राणु में तीन विशिष्ट दोषों द्वारा चिह्नित किया जाता है  कम शुक्राणु संख्या, खराब शुक्राणु गति और असामान्य आकार।
 हालात काफी गंभीर थें लेकिन उत्साह थोड़ा भी कम न था। इस विषय पर इंदिरा आईवीएफ कि आईवीएफ विशेषज्ञ डॉ पल्लवी उंटवाल ने विस्तार से बताया कि " पहले तो उन्होंने एआरटी को 12 बार सेल्फ एग (यानी खुद का अंडा ) देने का प्रयास किया था, जो सभी में विफल रहे, इसके बाद दाता (डोनर )अंडे का उपयोग करते हुए दो बार गर्भपात हुआ। ऐसे में  स्वस्थ अंडे के आरक्षित और शुक्राणुओं के युगल स्तर को देखते हुए, दाता भ्रूण का विकल्प चुनना सबसे अच्छा विकल्प होता है। डोनर भ्रूण आनुवंशिक रूप से और शारीरिक रूप से स्वस्थ होते हैं और गर्भाशय में आरोपण की बेहतर संभावना रखते हैं, और बाद में जीवित जन्म लेते हैं।