'रिफण्डÓ ने हंसाया तो 'सूखे दरतÓ से आंखें हुईं नम

Dec 07 2020

ग्वालियर। कोरोना के चलते रंगमंच के अल्पविराम को पीछे छोड़ शहर की रंग संस्थाओं ने दो नाटक एक साथ सफलतापूर्वक मंचित कर न केवल रंगकर्मियों में वरन नाट्य प्रेमी दर्शकों में भी जोश भरने का सार्थक प्रयास किया।
भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबंध संस्थान के आडिटोरियम में दो नाटकों का मंचन किया गया। पहली प्रस्तुति थी मेरा मंच फेम गीतांजलि गीत के निर्देशन में नाटक रिफंड के रूप में। रिफंड नाटक कारिन्धी द्वारा लिखित है जिसका अनुवाद परसिवल वाइल्ड ने किया है। लगभग 40 मिनट की यह प्रस्तुति वीमेंस थियेटर क्लब के बैनर तले तरुण होते रंग कर्मियों के अभिनय से सजी थी। शिक्षा विभाग की नकारा प्रणाली पर सटायर रिफंड में युवराज शर्मा, प्रशांत मिश्रा, ऋषभ शुला, रजनी दुवे, उमंग शर्मा, अनिकेत दुवे ने दर्शकों को हंसाने में कुछ हद तक कामयाबी पाई। स्कूल हाईस्कूल स्तरीय युवा उत्सव में ऐसी प्रस्तुतियों को खूब प्रशंसा मिलती है।
दूसरा नाटक सूखे दरत नाम से खेला गया। सतीश कलमकर लिखित और सचिदानंद जोशी के द्वारा नाटक सूखे दरख़्त का मंचन रंग सारथी संस्था के लिए रविन्द्र जगताप के निर्देशन में हुआ। सूखे दरख़्त नाटक के तीन मुय पात्रों को शहर के वरिष्ठ रंगकर्मी अशोक सेंगर ने मास्टर जी बनकर, बंटी विजय शर्मा ने चौधरी जी का किरदार निभा कर और गोपाल देशपांडे ने चौबे जी को अपने अंदाज में पेश किया। अभिनय की द्रष्टि से अशोक सेंगर ने उम्रदराज मास्टरजी के जरिए जीवन की कड़वाहट को संजीदगी से अभिनीत किया।  बंटी विजय शर्मा ने अपनी संवाद अदायगी में मेहनत करके एके हंगल स्टाइल को पूरे मंचन के दौरान क़ायम रखा और प्रभावित किया।
गोपाल देशपांडे के हिस्से में दो अच्छे दृश्य आए। पिंजरे के पंछी रे गाने ने जो गंभीर माहौल बनाया वो आखिरी दृश्य में खराब फोन से अपने बच्चों से झूठ मूठ बात करना दर्शकों की आंखों को नम कर गया। कोरोना के डर और आशंका को परे धकेल बड़ी संया में पहुंचे दर्शकों के सामने दोनों नाटकों के सफल मंचन के लिए अभिनेताओं सहित पूरी टीम और दोनों निर्देशकों को बहुत बहुत बधाई।
तकनीकी पक्ष
संभवत: सभागार में पहली बार शहर की नाट्य संस्था के नाटक मंचन में दोनों नाटक में संवाद दर्शकों तक बिना किसी रुकावट के पहुंच रहे थे यह आडिटोरियम की साउंड बात रही। रिफंड में जहां मेकअप से कम उम्र कलाकारों को बड़ा दिखाने की कोशिश की गई वहीं दूसरे नाटक के सूखे दरख़्तों को नेचुरल तरीके से बूढ़ा दिखाया। इसमें पात्रों का सटीक चयन काम कर गया। ज्यादातर समय जनरल लाइटिंग में ही सारा नाटक खेला गया फिर भी बीच वाले पात्र के चेहरे पर फोकस न होना खल रहा था। वेशभूषा नाटयानूकूल रही वहीं मंच सामग्री और सेट चलता नजर आया।