गोपाल किरन समाजसेवी संस्था व जय भीम अनुसूचित जाति जनजाति कल्याण समिति द्वारा हाथरस घटना व पुलिस के व्यवहार की निंदा करते हुए ने श्रद्धांजलि अर्पित की

Oct 01 2020

ग्वालियर। देश को शर्मसार करने वाली घटना की पुनरावृत्ति होने पर हाथरस के दुष्कर्म पीडि़ता के निधन व पुलिस द्वारा मृतिका के शव को परिजनों को सुपुर्द न करने जैसे निंदनीय पर कृत्य पर घोर निंदा करते हुए गोपाल किरन समाजसेवी संस्था व जय भीम अनुसूचित जाति जनजाति कल्याण समिति शील नगर बहोड़ापुर,जिला बाल अधिकार मंच  (चाइल्ड राइट ऑब्जर्वेटरी), व दलित फोरम नेटवर्क द्वारा  आंनद नगर से बहोड़ापुर तक कैंडल मार्च सुनीता गौतम के नेतृत्व श्रीप्रकाश सिंह निमराजे, गोपाल किरन समाजसेवी संस्था के मार्गदर्शन में मनीषा बेटी और अपनी सभी बहन बेटी के  न्याय के लिए लोकतांत्रिक तरीके अपनी आवाज उठाने हेतु, कैंडल मार्च निकाला गया और मनीषा वाल्मीकि हत्या कांड में  पीडि़ता को श्रद्धांजलि अर्पित की।
श्रद्धांजलि सभा मे सम्मिलित सदस्यों ने आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा कि इस प्रकार के कृत्य करने वाले लोगों के खिलाफ कठोर कार्यवाही करते हुए फांसी की सजा सुनाई जावे। परिजनों को यथासंभव मदद मुहैया कराई जावे। बेटियों के साथ होने वाली घटनाओं को रोकने के लिए कठोरतम प्रावधान किए जावे। साथ ही शासन प्रशासन में बैठे लोगों पर जो अपराधियों को बचाने का प्रयास करते हैं उन पर भी प्रभावी कार्यवाही होना चाहिए। 
संस्था ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि वाल्मीकि समाज की एक बेटी मनीषा हाथरस में कुछ दरिंदों की दरिंदगी का शिकार होकर जिंदगी की जंग लड़ते हुए हार गई है। वही नहीं उस जैसी और न जाने कितनी देश की बेबस बेटियाँ आए दिन दरिंदगी का शिकार होकर दम तोड़ रहीं हैं और दरिंदे बेखौफ होकर घूम रहे हैं कोई उनका कुछ नहीं बिगाड़ पा रहा है इन दरिंदों का कोई कोई धर्म कोई जाति कोई मजहब नहीं होता है दरिंदे तो बस दरिंदे होते हैं फिर बेटी चाहे किसी भी जाति वर्ग धर्म और समाज की हो बेटी तो बेटी ही होती है बस फर्क इतना होता है कि यदि वह कथित उच्च वर्ग/वर्ण या मध्यम वर्ग से हो तो उसके साथ पूरा समाज देश न्याय की गुहार लगाने सड़कों पर उतर आता है पर यदि यही  बेटी किसी निम्नवर्ग या हाशिए पर खड़े समाज की हो तो उसके लिए उसी वर्ग या समाज के लोगों को आगे आना पड़ता है ऐसा क्यों? क्या ये देश की बेटियां नहीं हैं? क्या सरकार बनाने में इनका योगदान नहीं होता? फिर क्यों शासन प्रशासन बिना धरने प्रदर्शन के इन दरिंदों पर हाथ नहीं डालता हैं। ऐसे दरिंदों को तो फांसी की सजा होनी ही चाहिए पर ये बैखौफ होकर घूमते रहते हैं। यदि किसी तरह गिरफ्तार कर भी लिए गए तो जमानत पर छूटकर सबूत मिटाने की कोशिशें करते हैं सालों-साल अदालतों में केस खींचकर आराम से जीवन बिताते हैं आज कहां गए वह सारे लोग जो कैंडल लेकर सामान्य वर्ग की बेटियों पर हुए अत्याचारों के लिए सड़कों पर उतरे थे क्योंकि वह बेटी निर्भया और प्रियंका रेड्डी थीं उनके लिए  दरिंदों का एनकाउंटर किया गया फांसी पर लटकाया गया। फिर इस बेटी के लिए शासन प्रशासन 14 सितम्बर से आज तक मौन क्यूँ बना हुआ है। 
मार्च मे साथी अनुष्का गौतम, जहाँआरा, वीडियो वॉलिंटर, गोआ, अवनी गौतम, निर्मला पारस, चेरी वर्मा, डॉ. बबीता, सीमा पंडोरिया, उमा नौगरैया, पार्वती बंसल, काजल कदम, नीतू वर्मा कविता वर्मा, प्रतिभा मोर, शीतल रायकवार, कल्पना राजे, कृपाल सिंह , लवकुश शर्मा, जितेन्द्र कुमार, कव्यंस सरदार सिंह, बलवीर पांडेय, अशोक कुमार, आकांक्षा, प्रीति वर्मा, लोकेंद्र कुशवाह ने भागीदारी निभाई सभी ने श्रद्धा सुमन अर्पित किए।