परिग्रह और उपसर्गों को सहन करना मुनि धर्म का कर्तव्य है-मुनिश्री

Aug 20 2020

ग्वालियर। आचार्य श्री शांति सागर महाराज जैन जगत के ध्रुव तारे हैं जिन्होंने 20 वी सदी में मुनि परंपरा को आकाश की ऊंचाइयों प्रदान की है। संत और तीर्थंकर भविष्य की सोच कर ऐसे कार्य कर जाते हैं जो भक्तों के दिलों में इतिहास बनकर अंकित हो जाते हैं। परिषह और उपसर्गों को सहन करना मुनि धर्म का कर्तव्य है। मुनि की मुद्रा बालक की तरह निर्विकार मुद्रा है। इसीलिए भगवान की पूजन में मुनि मन सम उज्जवल नीर की उपमा देकर जल समर्पित किया गया है। आचार्य शांति सागर ने अपने जीवन में मुगल सम्राटों को अहिंसा का पाठ पढ़ा कर जैन धर्म की जो प्रभावना की है वह संपूर्ण जैन समाज के लिए अनमोल धरोहर है । यह विचार क्रंातिकारी मुनिश्री प्रतीक सागर महाराज ने गुरुवार को आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज का 66 वा समाधि मरण महोत्सव पर सोनागिर स्थित आचार्य पुप्षदंत सागर सभागृह में धर्मसभा को संबोधित करते हुए कही।
मुनि श्री ने आगे कहा कि मृत्यु पर जो विजय प्राप्त कर लेता है वही मुनि होता है जो डर और भय के साए में जीता है वह मुनीम होता है और जो जगत को निर्भय बनाने वाले धर्म का पाठ पढ़ाता है वह मुनि होता है। रोटी तपती है। तभी खाने के योग्य होती है। सोना तपता है तभी वह गहना बनता है साधक जितना बहर मुखी से अंतर्मुखी होता है उतना ही साधना की ऊंचाइयों को छूता है महापुरुष के आदर्श हमारे लिए प्रेरणा पुंज है। जिनके ऊपर चल कर हम इस जीवन को और आने वाले जीवन को उज्जवल बना सकते हैं ।
 चातुर्मास समिति के प्रचार मंत्री सचिन जैन ने बताया कि  गुरुवार को आचार्य पुष्पदंत सागर सभागृह में बीसवीं सदी के महान आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज का 66 वा समाधि मरण महोत्सव धूमधाम से क्रांतिवीर मुनि श्री प्रतीक सागर महाराज के निर्देशन में मनाया गया। महोत्सव का शुभारंभ मंगलाचरण पूर्वक किया गया। तत्पश्चात आचार्य श्री शांतिसागर जी के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलन मीरा दीदी श्रीमती ज्योति जैन सपना जैन यश जैन अनु जैन ने किया अष्ट द्रव्य चढ़ाकर गुरु पूजन की गई। कार्यक्रम के अंत में भक्ति भाव पूर्वक आरती की गई।