समय कभी किसी की प्रतीक्षा नहीं करता:आचार्यश्री सुबल सागर
Oct 16 2025
ग्वालियर। समय कभी किसी की प्रतीक्षा नहीं करता है केवल पुरुषार्थ पर ध्यान रखो। धर्म का समय निश्चित नहीं करो आज से ही धर्म शुरू करो। यदि यही राग भगवान के गुणों के ओर मुड़ जाए तो आत्मा का विकास शुरू हो जाता है। यही राग वीतराग में बदल जाता है। संसारी प्राणी मात्र व्यापारिक वस्तु में उतार-चढ़ाव के भाव समझता है, वीतराग भाव की और दृष्टि नहीं जाती। यदि प्रवचनों में संसारी बातों को बोला जाता है तो उसे अच्छा लगता है आनंद आता है लेकिन यदि अध्यात्म की चर्चा हो तो आनंद नहीं आता। लेकिन पुण्य शाली भव्य जीव को यदि चर्चा आध्यामिक की हो तो वह अपनी आत्मा को परमात्मा बनाने हेतु प्रयास शुरु कर देता है। भव्य पुण्य शाली को गुरुओं का सान्निध्य प्राप्त हो जाता है तो कल्याण हो जाता है। हमें संसारी कार्यों को छोडक़र करके आत्म कल्याण के धर्म कार्यों में मुख्यता देना चाहिए। यह विचार आचार्यश्री सुबल सागर महाराज ने गुरुवार को धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
आचार्यश्री ने कहा कि भौतिक वस्तुओं का रस तो सभी अनुभव कर सकते हैं, लेकिन आत्मिक गुणों का अनुभव केवल वही कर सकता है जो आत्मा के गुणों को जानता हो। धर्म गुणों का आधार है, जो व्यक्ति को सही राह दिखाता है और जीवन को सार्थक बनाता है। धर्म का मूल ध्येय मानवता और सत्य के मार्ग पर चलना है, जो व्यक्ति को पाप और आसक्ति से दूर रखता है। धर्म ही वह साधन है जो व्यक्ति को सांसारिक दुखों से पार ले जा सकता है। इसके लिए मिथ्यात्व से दूर रहना और आत्म-साधना करना आवश्यक है। शरीर में शक्ति की आवश्यकता है वैसे ही प्रत्येक कार्य में धर्म की आवश्यकता है। धर्म शब्द का सामान्य अर्थ कर्तव्य भी है, आत्मा की शुद्धि का साधन धर्म है।
संपादक
Rajesh Jaiswal
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