भाव से मुक्ति है, बंधन है सुख और दुख है-आचार्यश्री
Sep 10 2025
ग्वालियर। अहंकार के कारण व्यक्ति सारी अच्छाइयां भूल जाता है और स्वयं की कमी, दोषों और दुर्बलताओं को स्वीकार नहीं करता और उसका व्यक्तित्व अपूर्ण रह जाता है। यह सब अहंकार के कारण होता है। भाव से मुक्ति है, बंधन है सुख और दुख है। भाव का प्रवाह पल पल बदलता रहता है जैसे पताका लहराती रहती है वैसा ही हमारा मन हमेशा ऊपर नीचे, इधर-उधर होता रहता है। यह विचार आचार्यश्री सुबल सागर महाराज ने बुधवार को नई सडक़ स्थित चंपाबाग धर्मशाला में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
आचार्यश्री ने कहा कि शिक्षक की थोड़ी सी समझदारी से बच्चे का कॅरिअर संभल जाता है और वह मेहनत और लगन से पढ़ाई करता है। पक्षपात से बचो। आशक्ति और अहंकार होगा तो पक्षपात निश्चित रूप से होगा। निष्पक्ष प्रवृत्ति के लोग हमेशा अपने बच्चे को सुधारने के लिए दूसरों से तक कह देते हैं इसको इतना मारो कि हमेशा इसे याद रहे यह कार्य नहीं करना है। यदि गलत कार्यों में बच्चों का दोष छुपाने का प्रयास किया तो वह आपको नुकसान हो जाएगा बच्चे का जीवन भी उसी तरह का हो जाएगा।
आचार्यश्री ने कहा कि वर्तमान समय में युवाओं को व्यसन और युवतियों को फैशन ने जकड़ लिया है। युवा पीढ़ी को इस गलत आदत से बचना चाहिये। यदि इस गलत आदत से नहीं बचे तो जीवन बर्बाद होने से कोई नहीं बचा सकता है। फैशन के दुष्परिणाम आज हम देख रहे है कि संस्कारी समाज का पहनावा भी बिगड़ता जा रहा है। आज हर घर में देखा-देखी का माहोल नजर आता है। इस फैशन से हम स्वयं भी नहीं बच पा रहे है और बच्चों के साथ भावी पीढ़ी को भी नहीं बचा पा रहे है। हर व्यक्ति अपने जीवन में समझोता करके जी रहा है।
संपादक
Rajesh Jaiswal
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