कर्मों के बंधन से ही संसार में जन्म-मरण का चक्र चलता रहता है: आचार्यश्री

Aug 24 2025
ग्वालियर। प्रत्येक कर्म का फल अवश्य मिलता है, चाहे वह अच्छा हो या बुरा। यह फल वर्तमान जीवन में या भविष्य में भोगना ही पड़ता है। कर्मों के बंधन से ही संसार में जन्म-मरण का चक्र चलता रहता है। जब तक कर्मों का क्षय नहीं होता, तब तक इस बंधन से मुक्ति नहीं मिलती। कर्म के सिद्धांत और उसके जीवन पर पडऩे वाले प्रभावों पर केंद्रित होता है। कर्मों से मुक्ति का मार्ग है, सम्यक ज्ञान, सम्यक दर्शन और सम्यक चरित्र। इन गुणों को धारण करके व्यक्ति कर्मों के बंधन से मुक्त हो सकता है। यह विचार आचार्यश्री सुबल सागर महाराज ने नई सडक़ स्थित चंपाबाग धर्मशाला मे धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
आचार्यश्री ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार करता है, तो उसे भी अच्छे परिणाम मिलेंगे। इसके विपरीत, यदि कोई व्यक्ति दूसरों के साथ बुरा व्यवहार करता है, तो उसे भी बुरे परिणाम भुगतने पड़ेंगे। उन्होंने आगे कहा कि क्रोध में अग्नि होती है। जैसे अग्नि दूसरे को जलाने के पूर्व पहले स्वयं को जलाती है। वैसे ही क्रोधी दूसरों पर क्रोध करने के साथ स्वयं का नुकसान करता है।अपने दोष अपनी दृष्टि में आ जाए तो दोष मिट सकते हैं। यदि दोष को दोष रूप में स्वीकार कर लेंगे तो ही यह संभव है। नकारात्मक सोच के लोग अपनी ही सोच से ही अशांत रहते हैं। क्रोध ऐसा करते हैं, जिससे शांति भंग हो जाती है। जीवन में दृढ़ संकल्प करें कि क्रोध नहीं करना है।
जैन समाज के प्रवक्ता सचिन जैन ने बताया कि आचार्यश्री सुबल सागर महाराज के मार्ग दर्शन में चातुर्मास स्थल जिन सहस्त्रनाम विधान में भगवान महावीर स्वामी की प्रतिमा का कलशों से अभिषेक जैन समाज के लोगो ने जयकारों के साथ किया। वही शांतिधारा की गई। वही आचार्यश्री ने जिन सहस्त्रनाम विधान में पूजन में मंत्र का उच्चारण कर महिला, पुरुष और समाजजनों ने भगवान जिनेंद्र के समक्ष महाअर्घ्य समर्पित किए।
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