धर्म और आध्यात्म की शिक्षा से ही जीवन का निर्माण हो सकता है-आचार्यश्री

Aug 23 2025

ग्वालियर। लौकिक शिक्षा से सुविधाएं तो मिल सकती हैं लेकिन आत्मिक सुख नहीं मिल सकता है। सच्चे सुख की प्राप्ति तो धर्म की शिक्षा से ही संभव है। लौकिक शिक्षा से जीवन का निर्वाह तो हो सकता है, जीवन का निर्माण नहीं। धर्म और आध्यात्म की शिक्षा से ही जीवन का निर्माण हो सकता है। लौकिक शिक्षा शरीर नष्ट होने के साथ ही नष्ट हो जाती है, लेकिन धर्म और संस्कार तो मृत्यु के बाद भी साथ रहते हैं। राष्ट्र के निर्माण में हर एक इकाई की भूमिका होती है। आज का बालक कल का नागरिक है। अच्छे नागरिक का निर्माण अच्छे संस्कारों से होता है। ज्ञान किसी किताब या शास्त्र में नहीं अपनी आत्मा में ही है। सच्चा ज्ञान वही है जो दुखों से मुक्त कर दे। यह विचार आचार्य श्री सुबल सागर महाराज ने नई सडक़ स्थित चंपाबाग धर्मशाला मे धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
आचार्यश्री ने कहा कि पाप की तो मर्यादा होती है पुण्य की मर्यादा नहीं होती। पुण्य के फल की मर्यादा होती है पाप के फल की नहीं। असीमित पुण्य का संचय मनुष्य को नर से नारायण बनाकर सिद्ध शिला में विराजमान कर देता है। आज हम सुबह उठते हैं तो हमारा जिनालय का रास्ता ही सही दिशा और दशा की ओर ले जा रहा है, अन्यथा भौतिक सुख-सुविधा के सभी रास्ते पाप की ओर धकेल रहे हैं। अत्यधिक कामनाएं एवं आकांक्षाओं के वशीभूत होकर पल-पल पाप की क्रियाएं कर रहे हैं। भारतीय संस्कृति ऐसी संस्कृति है, जो आचरणयुक्त विचारों पर चलती है। हमारे देश की संस्कृति व संस्कारों से बच्चों को संस्कारित करना अत्यंत आवश्यक है।